“चाय की आख़िरी घूँट”

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यूँ तो कई मसले निज़ी किस्म के होते हैं पर कई बार वो बा- वजह या बेवजह बा – मतलब या शायद बे-मतलब की बातों में फंसकर बस उलझ कर रह जाते हैं।

दरअसल हम ख़ुशी से ज्यादा किसी और चीज को तवज्जो देने लगे हैं आजकल या फ़िर शायद हम पुराने को बस तोड़ने की जद्दोजहद में हैं या शायद कुछ है जो हम या तो समझ नहीं पा रहे हैं या शायद समझना ही नहीं चाहते हैं । कभी “कास्ट” तो कभी “रिलीजन” और गर इत्तेफाक से इन सबसे बच गए तो “मध्यम वर्गीय मूल्य” अपनी तथाकथित संस्कृति का अवरोध खड़ा कर देते हैं ।

इतिश्री को दूर पहाड़ों में खुद का “कॉफी हॉउस ” खोलना था और मुझे बस उसके साथ कुछ सपने बुनने थे। लाख कोशिश करने के बाद भी जब फैमिली ने साथ देने से मना कर दिया तो हम दोनों ने ही अपने-अपने सपने और एक दूसरे का साथ चुन लिया। सब कुछ ठीक चल रहा था । उसके पसंदीदा राइटर के नॉवेल की पहली स्क्रीनिंग के लिए किस्मत से हमारा अधूरा बना हुआ कॉफी हॉउस उन्हें पसंद आ गया था । बाकी का काम हमें जल्द खत्म करने को कहा गया। इसी सिलसिले में आज शाम उसे चकराता जाना था पर मौसम खराब था और नवम्बर की बर्फबारी ने रास्ते को और मुश्किल कर दिया था । पर उसे तो बस जाना था ; किसी भी कीमत पर और कैसे भी ।

वो चली गयीहाँ बस चली गयी हमेशा-हमेशा के लिए । हमारे सपनों का कॉफी हाऊस जैसे बिखर सा गया हो। रात के तूफान ने मुझसे एक पल में जैसे सब कुछ छीन लिया हो । मैं क्षितिज़ पर अवाक सा खड़ा था या शायद कहीं शून्य में ? पता नहीं ।

पर वो सपने हमारे थे जिसे हमें पूरा करना था। क्या हुआ जो आज मेरे पास नहीं हो ? तुम्हारी बातों के गर्म स्पर्श आज भी तुम्हारे होने का एहसास दिलाते रहते हैं। आज पूरे दो साल हो गए हमारे कॉफी हॉउस को खुले हुए; ठीक तुम्हारे अठाईसवें जन्मदिन पर । तुम आज तुमसे न जाने क्यूँ ढेर सारी बातें करने का मन हो रहा है। मैं सीढ़ी से भागता हुआ कमरे में आ गया जहाँ तुम्हारा फेवरेट नॉवेल “चाय का आखिरी घूँट” खिड़की से आ रही हवा से खुल सा गया था। मैंने अलमारी खोली और नॉवेल को उठाकर अंदर बस रखा ही था कि अचानक हवा के एक तेज़ झोंके ने तुम्हारे कपड़ों की भीनी खुशबू को पूरे कमरे में फैला दिया जो अभी तक उस अलमारी में ही बंद थी। एक पल को लगा कि जैसे तुम वहीं कहीं मेरे आस-पास ही खड़ी हो शायद ।

विवेक